मिलिए त्रिपुरा में भाजपा की जीत के महानायक से!
भाजपा आज जिस त्रिपुरा जीत पर ढोल नगाड़े बजा रही है उसकी ज़मीन किसी ने यदि तैयार की है तो वो सुनील देवधर हैं। जिन्होंने केवल 1 व्यक्ति से संघ की शाखा लगाना शुरू किया था और आज नार्थ ईस्ट में लगभग हर राज्य के हर ज़िले के हर कोने में शाखा लगती हैं।
पूर्व में भाजपा के नार्थ-ईस्ट सेल के राष्ट्रीय संयोजक रहे सुनील देवधर को त्रिपुरा की जिम्मेदारी दी गई थी। इस पर भाजपा के पूर्वोत्तर विषयों के जानकार पहले से भाजपा की जीत के लिए आश्वस्त थे।
त्रिपुरा में 25 सालों से सीपीएम का एकछत्र राज था। कुछ ऐसा कि स्थानीय लोग अन्य पार्टियों के कार्यकर्ताओं से बात तक करने से डरते थे। सुनील देवधर ने एक अनोखी रणनीति के तहत इन लोगों तक पहुंच बनाने का एक कारगर तरीका खोज निकाला। नई रणनीति के तहत भाजपा कार्यकर्ता लोगों से अगरतला से धर्मनगर जानेवाली ट्रेन में मिलने लगे। ‘मोदी टी-शर्ट’ पहने ये युवा लोगों में बुकलेट्स बांटते। बांग्ला और स्थानीय भाषाओं में उनसे सरकार की विफलताओं पर बातें करते। उनके मोबाइल नंबर्स हासिल करते। रोज़ाना इस काम से लगभग 700 नंबर हासिल होते, जिनमें से 200-300 नंबर्स पर व्हाट्सऐप होता था। अगला स्टेप आसान और आजमाया हुआ था। व्हाट्सऐप के माध्यम से उन तक तमाम मैसेजेस, वीडियो पहुंचाए जाते थे।
इस यूनिक स्ट्रेटेजी के चलते बीजेपी का त्रिपुरा की जनता से सीधा संपर्क स्थापित हो गया। यह आईडिया सुनील देवधर के खुद का था।
संघ के प्रचारक होने से शुरू हुआ सुनील देवधर का सफ़र आखिरकार उस मुकाम तक आ पहुंचा है, जहां उनके नाम एक भव्य उपलब्धि दर्ज हो गई है। जिस राज्य में पिछली बार बीजेपी का खाता भी नहीं खुला था, वहां दो तिहाई से ज़्यादा सीटें झटक लेना किसी करिश्मा से कम नहीं।
श्री सुनील देवधर मूलतः महाराष्ट्र से हैं। 29 सितंबर 1965 को पुणे में पैदा हुए सुनील देवधर ने मुंबई से एमएससी बी.एड किया तक की पढ़ाई की है। वो 1991 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे हैं। उनका कार्यक्षेत्र हमेशा से नॉर्थ-ईस्ट रहा है। 1994 में वो नॉर्थ-ईस्ट के प्रमुख शिलोंग में प्रचारक थे। वहां वह शाखा में लाठी चलाने का प्रशिक्षण देते थे। देवधर इस बात को इस तरफ भी बयान करते हैं कि उनका सफ़र दंड से राजदंड तक का है। यानी लाठी की ट्रेनिंग देने से लेकर पॉलिटिक्स तक। 2002 तक वो प्रचारक बने रहे। धीरे-धीरे उनकी नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति में प्रासंगिकता बनने लगी। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह उनका स्थानीय लोगों से जुड़ा कनेक्शन था।
2005 में सुनील देवधर ने बी के बावरी के साथ मिलकर एक एनजीओ बनाया. नाम था ‘माई होम इंडिया’। इस संगठन का मकसद नॉर्थ-ईस्ट के लोगों को भारत की मुख्यधारा से जोड़े रखना है। ताकि पूर्वोत्तर के लोग भारत को अजनबी मुल्क न माने। आज यह संगठन अभी देश के 65 शहरों में है। ‘माई होम इंडिया’ चलाते वक़्त उनका स्थानीय लोगों से पहले से मज़बूत कनेक्शन और भी दृढ हो गया। लोगों के साथ इतनी आत्मीयता वाला कनेक्शन राजनीति में काम आने वाली चीज़ थी।
राजनीति में अभूतपूर्व सत्ता परिवर्तन विरले ही देखने को मिलता है। संघटन के प्रति समर्पण, लोगों से आत्मीय जुड़ाव और कड़ी मेहनत – इन गुणों के बल पर सुनील देवधर ने अभूतपूर्व राजनीतिक पटकथा लिख दी।
~ नवरंग एस.बी.

Political Analyst and Commentator, Interested in Political Strategy, Election Campaigns and E-Governance Implementation.

